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EK GAZAL

Written By jay on Friday, 30 March 2018 | March 30, 2018

तमाम  उम्र   रहा   दर्द   की   रिदा  ओढ़े 
थका हुआ था बदन सो गया क़ज़ा ओढ़े 

सुकूत तारी है जिस सिम्त भी नज़र डाली 
हयात   आयी   नज़र   दर्दे   इंतेहा  ओढ़े 

अभी जो आँख की कोरों में इक नमी सी है 
ये  अश्क जज़्ब ही  हो  जायेंगे  सज़ा ओढ़े 

क़फ़स  के  कैद  से  आज़ाद कैसे हो पाखी 
के  रूह  थक  गई  है  जिस्म की क़बा ओढ़े 

शफ़क़  सी  शाम  दरो  बाम पर उतर आई 
गमों   की   दर्द  भरी   देखिए   सदा  ओढ़े 

वफ़ा  की  खा के  कसम बेवफ़ा हुए कितने 
खड़ी  है अब भी ' वफ़ा ' देखिये  वफ़ा ओढ़े 

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