रहेगी ज़िन्दगी में आख़िरश ये तीरगी कब तक !
अता करते रहोगे तुम ग़मों की बानगी कब तक !!
कमाले हुस्न के जलवे निगाहे-नाज़ के फ़ित्ने -
तेरी जादूगरी से बच सकेगी सादगी कब तक !!
बड़ी मुद्दत से तेरी दीद को आँखें ये प्यासी हैं !
मुझे इतना बता दे तू मिटेगी तिश्नगी कब तक !!
सदाक़त के चरागों को जरा दिल में जला के रख !
तग़ाफ़ुल से करेगा तू बता ये बन्दिगी कब तक !!
हुई जो शाम तो छाये ग़मों के आज फिर बादल !
बचायेगी सफीना अब 'वफ़ा' का ज़िन्दगी कब तक !!
तग़ाफ़ुल=ध्यान न देना,

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