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EK GAZAL

Written By jay on Thursday, 12 July 2018 | July 12, 2018

रुखों के चाँद लबों के गुलाब माँगे है, 
बदन की प्यास बदन की शराब माँगे है। 

मैं कितने लम्हे न जाने कहाँ गँवा आया, 
तेरी निगाह तो सारा हिसाब माँगे है। 

मैं किस से पूछने जाऊं कि आज हर कोई, 
मेरे सवाल का मुझसे जवाब माँगे है। 

दिल-ए-तबाह का यह हौसला भी क्या कम है, 
हर एक दर्द से जीने की ताब माँगे है। 

बजा कि वज़ा-ए-हया भी है एक चीज़ मगर, 
निशात-ए-दिल तुझे बे-हिजाब माँगे है। 

~जाँ निसार अख़्तर

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